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कैदी चिट्ठियाएं

कैदी चिट्ठियाएं   (कविता)   


ख़तखाने के लेटरब़क्स में पड़ी है,
दूरदराज की अनमिज्ञ
अतल निंद्रा सो रही है कैदी चिट्ठियाएं।
तरह-तरह के अभिराम शबदों से लथपथ पड़ी है,
आकस्मिक पराधीन होने के लिए
गरमजोशी से रो रही है कैदी चिट्ठियाएं।

ना किसी ने बातें की,
ना ही किसी ने अपनेपन के बारे में बतलायीं;
सूरज के उजाले के साथ,
लेटरब़क्स खुलने के लिए कटिबद्ध खड़ी है,
डाकिएं के इन्तजार में
उत्साहित हो रही है कैदी चिट्ठियाएं।
मेरे और तुममें इतना ही अभिनव है,
मैं कैदी हूँ और तुम पराधीन हो।

                        -: मदन लाल सोलेवाल

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