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मैं सड़क हूँ!

मैं सड़क हूँ! (कविता) असंख्य राहगीर मुझसे मोहब्बत करते है कहीं अनन्त और कहीं कुछ पहर, लेहजा मैं भी मोहब्बत करती हूँ उनके लिए जो है हमसफर। इसलिए मैं सड़क हूँ! - : मदन लाल सोलेवाल
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कौन महादेश से आयी पाखी?

कौन महादेश से आयी पाखी? (कविता) कौन महादेश से आयी पाखी? कौन महादेश को जायेगी? बसंत का सौरभ लेके आयी, पँतझड़ की इस दुँनिया को फिर से यह बसायेगी! कौन महादेश से आयी पाखी? कौन महादेश क...

बाल-विवाह

बाल-विवाह  (कविता) आखिरकार क्या हो गया है? इन कच्ची उम्र और बच्चपन का ज़रा-सा सब्र न कर शारीरिक स्थिति और कुछ सपने बनाने से पहले ही रौंद-कौंद दिया जाता है। एक पुरखों की संजोयी ...

आदित्य

आदित्य  (कविता) सरदी का सुहाना सफ़र कुछ यूं ही दमक रहा है। पूँरव की ओर खरगोश की लाल आँखे दिखाने के लिए, 'तेव़र' सिन्धु के कूल के परे चमक रहा है। जैसे मानों -- पूरे जलधि में स्वर्ण ...

लक्ष्य की मेहनत

लक्ष्य की मेहनत  (कविता) शिक्षक ने गौर किया एक दिन शिष्य के लक्ष्य पे, शिष्य की मेहनत लक्ष्य से सामना कर रही है, लक्ष्य मेहनत को उलटा धकेल रहा है, नया प्रयास और नई लगन के साथ, फिर...

कैदी चिट्ठियाएं

कैदी चिट्ठियाएं    (कविता)    ख़तखाने के लेटरब़क्स में पड़ी है, दूरदराज की अनमिज्ञ अतल निंद्रा सो रही है कैदी चिट्ठियाएं। तरह-तरह के अभिराम शबदों से लथपथ पड़ी है, आकस्मिक पराधीन होने के लिए गरमजोशी से रो रही है कैदी चिट्ठियाएं। ना किसी ने बातें की, ना ही किसी ने अपनेपन के बारे में बतलायीं; सूरज के उजाले के साथ, लेटरब़क्स खुलने के लिए कटिबद्ध खड़ी है, डाकिएं के इन्तजार में उत्साहित हो रही है कैदी चिट्ठियाएं। मेरे और तुममें इतना ही अभिनव है, मैं कैदी हूँ और तुम पराधीन हो।                         -: मदन लाल सोलेवाल

अनार के पौधे।

हमारे खेत में अनार के कुछके पौधे लगाए गए है। लगभग दो साल के हो गए है। अभी फूल और अनार लग रहे है।