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आदित्य

आदित्य  (कविता)

सरदी का सुहाना सफ़र
कुछ यूं ही
दमक रहा है।
पूँरव की ओर
खरगोश की लाल आँखे
दिखाने के लिए, 'तेव़र'
सिन्धु के कूल के परे
चमक रहा है।
जैसे मानों --
पूरे जलधि में स्वर्ण के पथ
के अलावा
कुछ और नज़र नहीं आता
और शैलों की गलियारों से
और लीपा हुआ गेरूँ का चोका
बना खड़ियाँ चाँक का
अपना शंकुकार चेहरा
हर प्राणी में उष़ा की ऊर्जा
समा रहा है।
पहले अंकुरित हुआ आदित्य,
फिर आया बच्चपन की ओर,
अब धीरे-धीरे युवावस्था में
लौट रहा है।
वाँह प्रकृति! वाँह प्रकृति!

      -: मदन लाल सोलेवाल

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