कौन महादेश से आयी पाखी? (कविता)
कौन महादेश से आयी पाखी?
कौन महादेश को जायेगी?
बसंत का सौरभ लेके आयी,
पँतझड़ की इस दुँनिया को
फिर से यह बसायेगी!
कौन महादेश से आयी पाखी?
कौन महादेश को जायेगी?
साँवन का हिलोरा लेने आयी,
वर्षा के धारा के संग
अपना कंठ खोल रूची से
मँधुर गीत सुनायेगी!
कौन महादेश से आयी पाखी?
कौन महादेश को जायेगी?
हळोतियाँ का सगून लेके आयी,
खेतों की इस दुँनिया पे
नये जीवन बसायेगी!
कौन महादेश से आयी पाखी?
कौन महादेश को जायेगी?
सरदी-गरमी या हो वर्षा
तमाम इत्तफाक लेके आयी,
मन के रन्ध्रों की स्याही से
तन में ज्ञान रचायेगी!
कौन महादेश से आयी पाखी?
कौन महादेश को जायेगी?
अब नहीं होगा मेरा अंत
अभी-अभी तो आयी हूँ,
माँटी की इस खंडहर दुँनिया को
मैं नई राह दिखाऊंगी!
कौन महादेश से आयी पाखी?
कौन महादेश को जायेगी?
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-: मदन लाल सोलेवाल
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