सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

बाल-विवाह

बाल-विवाह  (कविता)

आखिरकार क्या हो गया है?
इन कच्ची उम्र और बच्चपन का
ज़रा-सा सब्र न कर
शारीरिक स्थिति
और
कुछ सपने बनाने से
पहले ही
रौंद-कौंद दिया जाता है।

एक पुरखों की संजोयी हुई
रूढ़िवादी रचना
अपितु प्रथा
जिसे कहते है 'बाल-विवाह'।

इसका असर सबसे ज्यादा
खासकर ग्रामीण क्षेत्र में
देखे जाते है
क्योंकि
यहाँ अशिक्षा
और कमजोर अर्थव्यवस्था है,
आखिर यहाँ कब तक?
शिक्षा की जागृति का
नवोजाला आयेगा।

अब तो सुधर जाओ
बाल-विवाह
कराने वाले लालची 'क्रीमीनल'।

         -: मदन लाल सोलेवाल

टिप्पणियाँ